शुक्रवार, 9 मई 2008

कैद-बा-मशक्कत -

दहलीज पे खड़ी, चमकीली सुबह को निहारते हुए,
डूब-सी गई मैं, अपनी यादों को सँवारते हुए।
वक्त कैसे बदल गया,
जान ही नहीं पाई,
दहलीज पे खड़ी अपनी सीमाओं को
पहचान नहीं पाई।
कोई लक्ष्मण-रेखा नहीं थी,
क्योंकि शायद, मैं सीता नहीं थी,
ख़ुद को कभी सीमाओं में बाँध नहीं पाई।
फ़िर भी अजब-सी कशमकश है उफ़! ये,
अब तलक इस देहलीज को लाँघ नहीं पाई।
पिंजरे में कैद पंछी की तरह छटपटाती रही,
उड़ने की लगन भी थी,चेष्टा भी,
पर मैं अपने स्वप्न-गगन को नाप नहीं पाई।
चाहती तो पिंजरे को छोड़ सकती थी मैं
दरवाजे तो खुले ही थे,
पर कदम क्यों नहीं बढे ये जान नहीं पाई।
मन तो पंछी है ही;
उड़ता रहा खुले आकाश में,
पर मैं अपने पंख पसार नहीं पाई।
गुलाम नहीं थी, फिरभी आजाद नहीं थी,
शायद इसलिए, क्योंकि मैं अपने
"कैद-बा-मशक्कत" को मान नहीं पाई।

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