बहुत-सी बातें अधूरी रह जातीं हैं जीवन में
पर मन, फिरभी सोचता है
निरंतर यही चाहता है,के काश!
कभी वो पुरी हो पातीं
काश!
बादलों से भरे आकाश में, मैं भी
अपने अरमानों के पंख पसारे
परिंदों की तरह स्वछन्द, स्वतंत्र उड़ पाती
काश!
पर यह मुमकिन नहीं,
यही जिंदगी की हकीकत है शायद
पर काश!
काश, के मेरा मन भी फूलों की तरह
निश्छल, निर्मल, कोमल होता
काश के मैं भी कभी जिंदगी को पाती,
काश के मैं सही मायनों में जी पाती,
पर आज यह भी मुमकिन नहीं।
जिंदगी तो कब की दम तोड़ चुकी है,
और सच!
ग़लत भी क्या हुआ है ?
मुर्दों के बीच आख़िर जिंदगी भी
अपना अस्तित्व कैसे पाती
पर काश!
फिरभी मैं जी पाती,
काश, मैं जी पाती
काश!

1 टिप्पणी:
Dear Mugdha,
I m Very much impressed with your poem.
Best of Luck
Bharat Jain
Editor
Kalptaru Patrika
Kalptaru Publishers Pvt. Ltd.
Agra UP
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