शनिवार, 17 मई 2008

पश्चाताप

हाय ! पछता रहा था वो आज,
क्यों बसाया अमीरों की नाली पर बसेरा।
कहीं जगह ना दी अमीरों ने,
और यहाँ से भी उजाड़ फेंका उसे होते ही सवेरा।
काली तो रातें होती ही हैं,
परन्तु, उजाले में भी छाया है अब अँधेरा।
पछता रहा था वो आज,
गरीब था, बेबस था, और था वो अकेला।
छोटी-सी झोपड़ी में, बीती है उम्र तमाम उसकी,
संपत्ति के नाम पर था एक टूटा-सा ठेला।
आँखें मलता उठा तो देखा,
आस-पास लगा हुआ था बहुत-से अमीरों का मेला।
सफाई-पसंद अमीर, पहुंचे वहाँ अकस्मात् उस रोज,
और कहा "नाली गन्दा कर दिया तुमने हमारा,
क्या खो दिया है अपना होश? "
" हटालो अपनी झोपड़ी, वरना ! देंगे हम उजाड़ कर फेंक।"
आक्रांत, सहम गया गरीब,
उन अमीरों के रोष को देख।
कुछ कह ना सका बेबस,
कर लिया उसने किनारा,
समझता था, हर कोई वहशी है,
कोई ना देगा सहारा।
दो-पल में ही उजाड़ दिया उसका संजोया हुआ डेरा,
अमीरों की नाली पर से भी, गया वो बेबस खदेडा।
उफ़! पछता रहा था वो आज,
क्यों बसाया अमीरों की नाली पर बसेरा।

1 टिप्पणी:

samagam rangmandal ने कहा…

अमीर की नाली से खदेडे गए....गंदगी खदेडने वालो की।