शनिवार, 10 मई 2008

विरासत

क्या व्यथा थी उसकी,
उफ़! ये कैसी दशा थी उसकी।
सड़क किनारे बैठा
एक बूढा, बेबस, लाचार-सा
आते-जाते हर किसी को अपनी
सुनी आँखों से निहार रहा था।
आवाज गले से निकली नहीं कभी उसके ,
पर अपनी सुनी, बेबस आँखों से ही पुकार रहा था।
उसकी करुण दशा देख, दो-पल को ठिठक गई ,
परन्तु बिना कुछ कहे ही वहाँ से गुजर गई,
यही शिलशिला चलता रहा साल-दर-साल।
आज दृश्य कुछ बदला;वो अकेला नहीं
और भी कोई था उसके साथ,
और आज एक नहीं
दो कटोरे पड़े हुए थे उसके पास।
यह सब देख उस रात सो पाई नहीं,
उसकी इस अवस्था से व्याकुल पर रो पाई नहीं।
अंततः,जा खड़ी हुई उसके समक्ष होते ही प्रभात,
परन्तु उसके कथन से हो गई
मेरी आत्मा भी आघात।
देने तो गई थी शिक्षा का दान,
उसे, जो लगा उस बेबस-बूढे के पोते समान।
परन्तु उस तिरस्कार को सह पाई नहीं,
सहानुभूति के कुछ और शब्द भी कह पाई नहीं,
उस घोर अपमान से थी बिल्कुल अनजान,
जो उस बेबस ने किया था, मुझे एक अमीर-भिखारन जान।
कहा- '' शिक्षा के एवज भिक्षा दे देती
तो ले लेता खुशी-खुशी,
गरीबी का मेरे, तुम क्यों उड़ती हो व्यर्थ हँसी।
शिक्षा तो मैं भी इसे दे ही रहा हूँ ,
तुम जैसों के बीच भी
इंसान बने रहने के गुर सिखा रहा हूँ।
हाथ फैला कर माँगने पर भी
ना देने वाले इस समाज के अमीरों की
अर्थ-व्यवस्था समझा रहा हूँ।
मजबूरन, परम्परा-गत, विरासत में
मैं इसे भी भिखारी बना रहा हूँ। "

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