सोमवार, 12 मई 2008

आईना

आईना देखती हूँ तो लगता है,
हाँ, खुश हूँ मैं!
परन्तु, आईना भी झूठ बोलता है,
कहाँ झाँक सकता है वो मन में,
कहाँ गहराइयों को नापता है?
मैं मुस्कुराती हूँ तो
अक्स भी मुस्कुराता है,
शायद मेरे संवेदनाओं की वो भी हंसी उड़ाता है।
टूटे हुए आईने में,
अक्स भी टुकड़े-टुकड़े हो जाता है,
पर किस कदर टूट रही हूँ मैं,
यह कहाँ नजर आता है?
कभी-कभी उस अक्स में,
अश्क भी छलकता हुआ-सा दिख तो जाता है
पर कहाँ महसूस करता है वो मेरी वेदना,
और कहाँ उदासी को जान पाता है?
डर लगता है अब आईने से
होते हुए रु-ब-रु,
न जाने वो भी मुझसे हरबार
क्यों छल कर जाता है,
मुझसे, मेरी ही हकीकत छुपाता है।
परन्तु, शायद यही अच्छा है,
कहीं मेरी परछाईं भी
मुझे धिक्कार न दे,
औरों की तरह वो भी,
मुझे अस्वीकार न दे।
शुक्रगुजार हूँ मैं आईने कि ,
के वो सच्चाई नहीं बताता है।
क्या हूँ मैं, इससे
मेरे अक्स कि भी पहचान नहीं कराता है॥

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